Lets write something – चलो ना कुछ लिखते हैं – hindi article

चलो ना कुछ लिखते हैं !
मुझे अब भी वो दिन याद आता है जब मैं स्कूल में था और इतिहास और भूगोल का पाठ पूरा करने में आना – कानी किया करता था | प्रथम विश्वयुद्ध, पानीपत की लड़ाई, बोस्टन टी पार्टी, चार्ल्स एक, चार्ल्स द्वितीय, तृतीय, कौन कब मारा, जिंदा हुआ क्या पता ? आधा वक्त तो बस तारीखें याद करने में ही जाता था | ऊपर से बड़े – बड़े जवाब, जिन्हें लिखते वक्त यह डर लगा रहता था कि कहीं गलती से यह प्रश्न परीक्षा में आ गया तो गए काम से ६ नंबर |

 
फिर वह दिन आया कि औपचारिक पढ़ाई ख़त्म हुई और मैं किसी भी प्रकार किताबी परीक्षा और गृह कार्य (HOME WORK) से मुक्त था | वाह ! एक बड़ा बोझ सर से उतर गया था, मानों किसी मध्यम वर्गीय व्यक्ति ने अपने घर की सालों की क़िस्त पूरी कर ली हो | महाबलेश्वर की पहाड़ियों के ऊपर सुकून का माहौल, ७ दिनों तक चलने वाले यूथ केम्प का पहला दिन, हाथ में एक पेन और कॉपी शायद कुछ लिखने के लिए दी गई हो | 
 
मुझे पता नहीं क्या और क्यूँ ? मैं तो बस उस शांत वातावरण का मज़ा ले रहा था जहाँ लगभग मेरे जैसे २०० लोग मौजूद थे पर चूँ  तक की आवाज़ नहीं थी | हवाएँ जब बहते हुए पेड़ों को छू जा रही थी तो मानों मखमल सा स्पर्श इन कानों को हो रहा था | सूर्य देव बस अभी – अभी स्नान करके निकल ही रहे थे | मेरे सामने एक बड़ा सा मैदान और उस मैदान से लगे हुए रोड़ पर घाँस का गट्ठर, जिसपर मैं विराजमान था | पता नहीं चला कि क्या हुआ, मैंने कलम के बटन को दबाया, डायरी खोली और धड़ा धड़ लिखना शुरू कर दिया | ३० मिनट के दिए गए मौन समय (MORNING SILENCE TIME) में एक बड़ी सी कविता लिख दी | कविता का पहला वाक्य, “मुझको क्या थी खबर, मैं कहाँ आ गया, खुद को खो कर है पाया, मैंने खुद को यहाँ” | खुश तो था और हैरान भी कि मामला क्या है ? जो भी लिखा था उसका कोई ज्ञान मुझे नहीं था, भला कोई खुद को खोकर कैसे पा सकता है ? जो भी हो, लग तो अच्छा रहा था |
 
उस मौन समय के बाद सभी का जमावड़ा एक थिएटर हॉल में हुआ, जहाँ सारे लोग आए | हमारे मेंटर मिस्टर विरल ने कहा कि जो भी आपने कहा है उसे हमारे सामने शेयर कर सकते हैं | उस दिन ना कोई झिझक महसूस हुई मुझे, ना किसी बात का डर | मुझसे ज़्यादा मेरे दोस्त परेशान थे कि राहुल कहाँ जा रहा है ? बड़ी ख़ुशी और गर्व के साथ मैं स्टेज के पास गया | बिना किसी भाषण बाजी के गुड मोर्निंग कह कर मैंने अपने शब्दों को लोगों के सामने रखा | चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए बड़ी ही शान्ति और संतुष्टि के साथ अपनी जगह आकर बैठ गया | मेरे सारे दोस्त सकते में थे कि मैं लिखता भी हूँ | सच कहता हूँ कि मुझे भी तब हही पहली बार पता चला कि लिख भी सकता हूँ |
 
उस दिन के बाद से आज करीब ८ – ९ साल हो गए हैं | सैकड़ों कविताएँ – गीत, कई लेख और नाटक, मेरा अपना ब्लॉग जिस पर आप यह लेख पढ़ रहे हैं इत्यादी लिखा | कई लोग पूछते हैं कितना कमा लेते हो, कब तक सेटल हो जाओगे | अरे भाई ! कमाना – गँवाना तो चलता रहेगा और आखिर ज़िन्दगी में कौन हुआ है आज तक सेटल | मेरा बस यही कहना है कि जब भी लिखता हूँ सुकून मिलता है | क्योकि मैं यह किसी के दबाव या ज़िम्मेदारी के तौर पर नहीं करता | यह मेरा home work नहीं है ना ही किसी परीक्षा में मुझे उत्तीर्ण होना है | जैसा हूँ वैसा ही प्रकृति का हूँ, लिखते वक्त ज़रा खो जाता हूँ और इसी खोने में खुद को पाता हूँ | हाँ… हर बार जब कलम कुछ वक्त के लिए ठहर जाती है तो फिर दिल कहता – चलो ना कुछ लिखते हैं |
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