Scent of the Soil – मिट्टी की ख़ुशबू – Hindi Article

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एक बीज ने मुझसे कहा कि मुझे मिट्टी में नहीं उगना मुझे तो हवाओं की सैर करनी है, ऊँचे आसमानों को छूना है। भला यह कैसे संभव है। मैंने उसे समझाया कि माना तेरे बहुत से सपनें हैं, तू खिलना चाहता है, बड़ा होना चाहता है, लेकिन तू जब तक अपनी मातृभूमि के गर्भ में तपेगा नहीं, वहाँ अपनी संभावनाओं को टटोलेगा नहीं तो कैसे टिक पाएगा इस बहती हवाओं में। बिना जड़ों के तो यह कर पाना बिल्कुल नामुमकिन है। भला मैं क्या करता, बहुत समझाया उस बीज को वह माना नहीं। वह उछला कुछ ऊपर हवा में, कुछ पल के लिए और छिटक दिया गया, फेंक दिया गया एक और। यह बीज हमारा उभरता हुआ समाज है। इसने भी अगर मिट्टी, अपनी मातृभाषा छोड़ने की कोशिश की तो बिना सांस्कृतिक जड़ों के इस समाज का हर एक व्यक्तित्व गुलामी के दलदल में धँस जाएगा और उसे पता भी नहीं चल पाएगा।

यूनेस्को द्वारा २१ फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त है और  बीज बचाने की यही कोशिश अनाम प्रेम परिवार पिछले ८ वर्षों से करता आ रहा है। हर वर्ष यह कार्यक्रम पालघर के आतंरिक गाँव वालों के साथ (कोली लोगों) के साथ मनाया जाता आया गया है। इस वर्ष यह कार्यक्रम मनोरी गाँव में भी मनाया गया। वहाँ के मच्छीमार स्थानिक ईस्ट इन्डियन इस कार्यक्रम में उपस्थित थे, जिन्हें मुम्बई का लैंडलॉर्ड अर्थात ज़मीन का मालिक जाना जाता है। ईस्ट इन्डियन समुदाय के बच्चों, युवाओं व बुज़ुर्गों, सभी ने मिलकर स्थानिक परिधानों, गीतों व नृत्यों की सहायता से अपनी संस्कृति को लोगों के सामने रखा साथ ही अपनी मातृभाषा को संजोए रखने का सन्देश दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत वहाँ उपस्थित विभिन्न भाषीय लोगों द्वारा अपनी मातृ भाषा में “माँ” शब्द लिखने से हुई, जिसके अंदर भारत की वभिन्न भाषाओं के साथ साथ चाइनीज़, जापानीज़ जैसी कुल ३० भाषाओं का समावेश था । इसके पश्चात अनाम प्रेम व ईस्ट इन्डियन समुदाय के लोगों द्वारा अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा मनोरंजक खेल खेले गए। इस कार्यक्रम में अन्तर्राष्ट्ररेय अतिथियों के रूप में अफगानिस्तान व ज़िम्बाब्वे से आए कुछ विद्यार्थी भी शामिल थे और उन्होंने भी अपनी अपनी मातृभाषा में गीत गाए। कार्यक्रम के अंत में ईस्ट इन्डियन समाज के युवाओं ने उनके सामजिक गीतों को एक शैली में ढालकर सबके सामने गीत व नृत्य के साथ रखा जिससे कि आनेवाली स्मार्ट पीढ़ी भी अपनी संस्कृति में रूचि ले और अपनी मिट्टी की सुगंध को ज़िंदा रख पाए।

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हमारे वर्तमान समय की दुर्दशा यहाँ है कि प्राणियों और वनस्पतियों के साथ-साथ हमारी स्थानिक भाषाएँ भी विलुप्त होती जा रही है। इसकी विलुप्ति का कारण अपनी भाषा की अवहेलना और परभाषाओं है। भाषाओं का सीधा सम्बन्ध संस्कृति से होता है। चोली और दामन के जैसा संग होने के कारण अगर भाषाएँ खो जाएँगी तो उससे जुड़ा समाज भी गुमनामी के गर्त में होगा। अनाम प्रेम परिवार यह कार्यक्रम सिर्फ एक रंगारंग पेशकश ना होकर आनेवाले कल के लिए एक उम्मीद भी है जो सदा अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखेगी। और मनोरी गाँव का ईस्ट इन्डियन समुदाय इस सराहनीय दिशा में अग्रसर है जिन्होंने ना कि अपनी संस्कृति को पकडे रखा है बल्कि उसके संरक्षण के लिए एक वास्तुसंग्रहालय की स्थापन भी की है।

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