बचपन – edited

“बचपन” शब्द सुनते ही लोगों के ज़हन में अनगिनत स्मृतियों की झालर जल उठती है। कहीं – कहीं पर यह झालरें रोशनी से परिपूर्ण जलती है तो कहीं – कहीं पर मद्धम धीमी जलती – बुझती रहती है। मस्तियाँ, चहल क़दमियाँ, शैतानियाँ, मौसम की हर अदा समेटे यह ‘बचपन’ हर किसी को एक खट्टी – मीठी तो कभी कुछ नीम सी कड़वी याद दे जाता है। जिसकी ‘कसक’ जीवन के अंत तक भर जाती है। कुछ ‘बातें’ जो अब ‘याद’ बन गयी है – जैसे कोई भूले – बिसरे किसी पुरानी धून या किसी लकड़ी के संदूक से निकला कोई पुराना मटमैला सा ‘लिफ़ाफ़ा’ हो।

अब जब – जब आँखें बंद किए इस आराम – कुर्सी पर हिलते – डुलते बैठती हूँ, तो अक्सर मेरा मन अपने बचपन की गलियाँ घूम आता है !! वो गलियाँ… जो भरी तपती दुपहरी में सन्नाटे से भरी पड़ी रहती थी… खिड़कियाँ – किवाड़ों से बंद.. और हम बच्चें उन गलियों से होते हुए यहाँ – वहाँ उछलकूद मचाया करते थे।
कभी आम, कभी इमली, अमरूद, शहतूत, जामुन के पेड़ों पर धावा बोलते। उन पर झूलते… चढ़ते-उतरते-गिरते.. फलो का एक ‘टुकना’ बना लेते… और फिर उस गाँव की ‘सब्जीवाली’ कि तरह… फ़ल बेचने का अभिनय करते.. और फलों को अक्सर… नमक मिर्च चुपड़ कर खाते..!!
कभी किसी एक के घर के बग़ीचे में… घने नीम… नीलगिरी के पेड़ों तले… घर बनाते..!
‘गर्मियाँ’ अक्सर सहेलियों, बहनों, घरों में आए रिश्तेदारों के बच्चों के साथ ही कट जाती थी।
हाँ..!! याद तो वो…’आमरस’ और ‘कुल्फ़ी’ वाला भी आता है… जो ५० पैसों में, १-२ रुपये में भी इत्तनी भरी गर्मी में हम सबको तर कर जाता था। भरपेट होने के बावजूद… हर दोपहर उसका इंतजार रहता।
हम सभी को एकसाथ डाँट पड़ती कि गर्मियों में ‘लू’ न लग जाए, लेकिन हमारी वो छोटी सी टोली किसी न किसी के बाग़ीचे में बैठे अपनी ही ‘दुनिया’ मे मस्त रहती। सुबह-शाम की सैर पर कभी हम खेतों पर निकलते, तो कभी सड़क के आख़िरी छोर पर पहुँच जाते। साथी ‘खेल-खिलौने’ बाँटने से मना न करते। न शहर का कोई शोर, न घरों की कोई पाबंदियाँ। शांत गाँव के उस वातवरण में रहते ग्रामीण जीवनशैली की छाप मन मे रच बस गई। धीरे-धीरे समय की गति में हम बच्चे स्कूल, कॉलेज, करियर की दौड़ और फिर अपनी गृहस्थी के चक्कर में फँसे तो फँसे ही रह गए। अब जब अपनी नई ‘जनरेशन’ के ‘बचपन’ को देखती हूँ तो सोचती हूँ कि….

लेखिका – दिव्या
instagram – @imperfectdeep

divya, hindi articles June 19, 2017 at 08:57PM

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